बढ़ते हुए हम, घटती हुई सामाजिकता
आज का दौर नया है रह गई बस कुछ यादें पुरानी हैं कहते थे हम यार हैं तुम्हारे पर तुम्हारी बेरुखी भी शौक से देखते हैं साथ चलते हैं लाखों की तादाद में पर भीड़ में भी खुद को अकेला समझते हैं संस्कारों की आदत खुद सिखाते हैं पर खुद के संस्कार यूं भूल जाते हैं जो वक्त आज तुम अपनों के लिए बचा रहे हो उस सफ़र को तय करने के काबिल किसी ने अपना वक्त लगाया था। आज महीनों पर एक मुलाकात से वर्ष गुजारते हो हम रोज मिल कर रंग जमाया करते थे आदत बदलने से अब क्या बदल जायेगा जो लम्हें जा रहें क्या वो कभी लौट के आएगा इन शब्दों को पढ़ एहसास होगा फिर क्या? थोड़े समय बाद वही सारे हालात होंगे सोच लिया है हमने इतना कि सारे जज़्बात बदल गये देखते देखते हम तुम क्या सारे हालात बदल गए।