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दो सिक्के

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 वो दो अलग-अलग सिक्के उछाल रहे थे  चित भी उनका और पट भी उनका ही था  समझ नहीं आ रहा था नासमझ थे या मुझे खंगाल रहे थे। आज भी मुलाकात में  वो मुझसे मेरी तरह ही मिलती है कहती है तुम सा मुझ में कहां कोई पर फिर उसकी निगाहें पल में बदलती हैं कहती है उसका(उसके नये महबूब) मेरे सिवा कहां कोई वो तो अब मुझे अपने महबूब के फसाने सुनाती है मैं उतना दिवाना कहां बड़ी शौक से जताती है!

मौजूदगी

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  मैं नहीं कहता कि प्यार में उसके सच्चाई ना थी  बात बस इतनी सी है मेरे नसीब में बेवफाई थी वो शायद वक्त के साथ किसी और का होता रहा  मैं बेफिजूल में उसकी याद में दिन रात रोता रहा  अब महफ़िल में उसके दिलदार कोई और हो गया  मैं खड़ा आज भी वहीं जहां मेरा सब कुछ खो गया  अब उनकी दलीलों पर मैं मन मुताबिक मुस्कुराता हूं  वो कहते हैं वो खुश हैं मैं अपने क़दम पीछे बढ़ाता हूं अब उनकी बातों में किसी और की मौजूदगी नज़र आती है बीते लम्हों की उनकी जिंदगी से रवानगी समझ आती है तब जिनकी नजरें दावे करती थीं  मुझे कभी नहीं भुलाएंगी आज वो बयां कर रहीं थी मेरी ना मौजूदगी अब उनको और नहीं सताएगी और  वो अब मुझे बड़े आसानी से समझाते हैं उन्हें आदत है उनके महबूब की उनकी निगाहें कहती हैं तुम जाओ अब मुझे जूस्तजू है बस  अपने सूकून की

आखिरी मुलाकात

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 आखिरी मुलाकात में मैंने मांगा तो था नहीं कुछ, ना तेरे पास आये थे ,मुझे पता था अपना दायरा, ना तुझे मिटाने के लिए मजबूर कराये थे पर तेरी उस बात ने बीते लम्हों का सब कुछ मिटा दिया बात बहुत बड़ी नहीं थी पर एक पल में ही गैर होने का एहसास दिला दिया ऐसा था नहीं की मैं तुमको छू देता और रही बात देखने की तो मैं क्या शायद घर के और भी लोग तुझे वैसे कभी न कभी देख लेंगे शायद मेरी नज़रों पर तुमको भरोसा नहीं था तुमको शक था कहीं नजरें मेरी दगा ना कर जाएं पर मुझे मेरे कायदे पता हैं, "अगर तुमने ना बोला है" तो अपने दायरे पता हैं चलो कोई नहीं मुझे मेरे दायरे समझाने के लिए ,मुझे मेरी हदें बताने के लिए तुम्हारा शुक्रिया पल भर में ही ऊंचाई से नीचे गिराने के लिए शुक्रिया शायद अब मुलाकात ना हो तुम रहो खुश अपनी दुनिया में खुदा करे जल्द ही वो दिन भी आए जब हमारी कभी बात ना हो 

किरदार

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  मुझे देखकर वो रोता बहुत है  पर कुछ ही देर में चैन से सोता बहुत है  कहता है सुकून का जरिया हूं मैं उसके पर देखा है मैंने हजारों के साथ सुकून से होता बहुत है नहीं कहता मैं कि सबको चाहता वो है  पर औरों से अटखेलियां दिखाती हैं उसे चाहने वाले बहुत हैं हां  उन हजारों की भीड़ में मेरा भी एक किरदार -ए-वजूद था उसकी खातिर  मैं खुद को सबसे दूर कर बैठा मुझ पर इल्ज़ाम बहुत था और सुनो वो खुद को संभालने में माहिर इतना निकला जिसको जैसी जरुरत थी उससे वो वैसे मिला पर मैं इस कदर टूट गया मेरा ग़म सबके सामने यूं ही आंखों से बेवक्त छलक निकला  खता उसकी भी ना थी मजबूरियां खूब बताई थी उसने  मैं तो मान भी गया नादानियां मुझसे हुई जो इस दिल ने नजदिकियां बढ़ाईं थी उससे  पर ज़हन में एक सवाल हर वक्त गुंजता है कैसे कोई आंखों से देखे तभी एहसासों में पिघलता है ? ओझल हुआ नहीं कि चंद लम्हों में कैसे उसका रवैया बदलता है ? पूछो अगर तो कहता है, क्या करूं सबकी अपनी-अपनी जगह मैं मुकम्मल करता हूं  तुझे क्या पता है मैं किस तरह अपने आप को बदलता हूं फिर क्या  इन दो चार जवाबो...

#तुम और मैं

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तुम्हें गुरुर है उसके होने का इतना ना तोड़ो की तुम में ही टूट कर बिखर जाए। साथ छोड़ दिया है तुमने, तो वक्त भी दे दो उसे   कुछ खुद में सिमट पाए । तुमको आदत है बस उसे अपना कहने की उसे आदत होती जा रही है तुम्हारी यादों के साथ रहने की। थोड़ा सा संभल जाओ तुम! खुद के लिए ना सही उस पर ही तरस खाओ । क्यों खुद तक समेट रखा है उसे उसे भी खुद के दायरे से आगे बढ़ाओ। जिंदगी में तुम्हारे लोग बहुत हैं अपनी जिंदगी के अहम पहलू उसके सामने भी लाओ। तुम में जो सिमट रहा है उसे उसकी सही पहचान से रुबरु कराओ । वक्त रहते थोड़ा तुम संभल जाओ, खेलों नहीं उसके जज्बातों से उसे भी जीने के नये मौके से मिलने का एहसास दिलाओ। 

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