ख्वाहिश


 मैं चाहता हूं

बड़ी शिद्दत से चाहे उसे उसका महबूब

हाथ थामे बैठे और सरगोशियां करें खूब

बेखबर आंखें खूबसूरत नज़ारे देखें बेफिजूल

उसकी मुस्कान ही अहम हो ऐसा बनाए उसूल

मैं सोचता हूं!

अगर मैं देख सकूं तो उसकी पूरी तस्वीर दिखाना 

गुम हो इश्क़ ए ख्वाब में ऐसी उसकी तकदीर बनाना

उससे जुदाई के अंजाम ए सफ़र पर बस मुझे चलाना 

मुझे खुद की रंजिशों का रंग खुद पर ही है चढ़ाना

मैं बयान करता हूं!

एतबार ए वफ़ा की थी अब बद्दुआओं में कैसे रखूंगा 

मेरा ना हुआ तो क्या हुआ अब भी मैं उस पर मरुंगा

हां अब नहीं कह सकता मैं कि मेरे दर्द की गहराई कम है

देख उसे उसके महबूब के साथ मेरी खुद से लड़ाई कम है पर अब भी  मैं खुद से रूठ जाता हूं !

अगर किसी कहे गए मेरे लफ़्ज़ों में उसकी भलाई कम है 

मैं खुद को रोक कहता हूं !

ऐ ख़ुदा !अश्कों के साथ कहे इन शब्दों में सच्चाई कम है।

 





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