इंतज़ार


 

सुनो 

मुझे पता है अब भी तुम बहाने नहीं बनाती

अरे

तुम तो मुझे पल पल का हिसाब हो दिखाती

अब

थोड़ा वो मेरे लिए पागलपन कम हो गया है

बस

जो सब कुछ मुझे बताती वो ख़तम हो गया है

सोचते हुए

अब सुबह से शाम तुम्हारे इंतज़ार में जाता है

बेसक

फिर तुम्हारा समय तुम्हारे ख्वाब में बीत जाता है

झलक 

तुम आज भी मुझे दिखाना नहीं भूलती 

जताती हो

तुम मेरी उलझनें मिटाना नहीं भूलती 


चलो सब कुछ मैं सही मानता हूं पर इस वक्त को भी मैं बखुबी जानता हूं 


फिर से वो दौर आएगा 

उतना ही तुम्हारे मन को वो भाएगा

तुम में बेताबी वैसी ही होगी 

और शायद उसके लिए समय की आजादी होगी 

फिर तुमको कामों में व्यस्तता ना रहेगी 

निगाहें पल भर भी दूरी ना सहेंगी

तुम इस कदर बेताब रहोगी 

उससे अपनी सारी चाहते कहोगी 

तब ना तुम्हारे दोस्त मित्र यार होंगे

बस दिल में उसके ही  जज्बात होंगे


तब मैं कुछ सवाल करूंगा हो सके तो खुद को जवाब देना 


कहां गयी वो पाबंदियां जो एक लफ्ज़ बोलने से रोकती थीं

कहां गए वो लोग जो बेवक्त तुम्हारे पास आते थे और तुम मुझे टोकती थी 

कैसे अब तुमको कामों के बीच में भी तलब उसकी लग जाती है 

पहले तो मुझे कहती थी ये हैं, वो हैं ,कैसे करुंगी बात बस खाली होकर बताती हूं

सुबह चार से दो इंतज़ार में बीताने पर जब तुम मिलती थी तुम्हारी आंखें नींद में ढलती थीं 

अब शुरू होता था सफ़र शाम तीन से रात दस ग्यारह का

जिसमें तुम ख्वाबों में मचलती थी 

आने पर बातें हंसी में टाल देती थी,कभी कभी तो उल्टा मुझ-पर ही डाल देती थी

कुछ पलों का फिर से खेल करती थी, तेरी निगाहों में सपनों की रेल चलती थी 

इसी दिनचर्या में शामिल मैं रोज़ होता था तुम गुम थी

 कहीं और मैं कम सोता था ।




 













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