दो सिक्के


 वो दो अलग-अलग सिक्के उछाल रहे थे 

चित भी उनका और पट भी उनका ही था 

समझ नहीं आ रहा था नासमझ थे या मुझे खंगाल रहे थे।

आज भी मुलाकात में 

वो मुझसे मेरी तरह ही मिलती है

कहती है तुम सा मुझ में कहां कोई

पर

फिर उसकी निगाहें पल में बदलती हैं

कहती है उसका(उसके नये महबूब) मेरे सिवा कहां कोई

वो तो अब

मुझे अपने महबूब के फसाने सुनाती है

मैं उतना दिवाना कहां बड़ी शौक से जताती है!



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