थक गया था मैं चलते चलते, कुछ दूर जाकर खड़ा था अब हिम्मत न थी मुझमें चलने की, जैसे कि मैं बेजान सा पड़ा था। तब तक दिख गई मुझे समुन्दर की वो लहरें ,जो कोशिश करने पर अड़ी थी आकर उन्हें किनारे से मिलना है, जो,सौ मिल दूर खड़ी थीं। ख्वाइशों का मंजर टूट सा गया था, आंखें नम हुई मेरी जैसे इस वक्त में मैं खुद अपने हाथों से छूट सा गया था। उन आंखों के आंसू में मुझे मां की झलक सी मिली कह रही थी तू गुरूर है मेरा ,इतनी जल्दी खुद से रूठ कैसे गया। रास्तों पर कांटे थे पैरों में मेरे छाले थे ,दिल थम सा गया था हिम्मत मेरी टूट सी गयी थी, मैं खुद से ही कुछ रूठ सा गया था तब तक आवाज़ आई एक अंदर से, ऐसे कैसे तू रुक गया, नजरें तेरी जिसे ढूंढ रही हैं वो मंजिल तेरी सामने खड़ी है। अब बचा नहीं कुछ मेरे पास उम्मीदें सारी छूट गई, देखें थे जो सपने वो शीशे की तरह टूट गए दिख गई मुझे परछाईं तब तक ,कह रही थी बाकी हैं कुछ करतब अभी तक, जीत तेरी होगी साथ हूं मैं जब तक। काला बादल घेरा था जीवन में मेरे हर जगह अंधेरा था, सांसें रुकने वाली थी नजरें झुकने वालीं थी दिल ने दिया झटका तब तक ,सून मेरी आवाज़ को ,...