#तुम और मैं



तुम्हें गुरुर है उसके होने का

इतना ना तोड़ो की तुम में

ही टूट कर बिखर जाए।

साथ छोड़ दिया है तुमने,

तो वक्त भी दे दो उसे 

 कुछ खुद में सिमट पाए ।

तुमको आदत है बस

उसे अपना कहने की

उसे आदत होती जा रही है

तुम्हारी यादों के साथ रहने की।

थोड़ा सा संभल जाओ तुम!

खुद के लिए ना सही

उस पर ही तरस खाओ ।

क्यों खुद तक समेट रखा है उसे

उसे भी खुद के दायरे से आगे बढ़ाओ।

जिंदगी में तुम्हारे लोग बहुत हैं

अपनी जिंदगी के अहम पहलू

उसके सामने भी लाओ।

तुम में जो सिमट रहा है

उसे उसकी सही पहचान

से रुबरु कराओ ।

वक्त रहते थोड़ा तुम

संभल जाओ,

खेलों नहीं उसके जज्बातों से

उसे भी जीने के नये मौके

से मिलने का एहसास दिलाओ। 

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