आजाद
क्या तेरा चेहरा कभी उसकी बाहों में होकर मेरे लिए उतरता है या हर बात पर उसकी तेरा चेहरा बेवजह खिलता है और अगर हकीकत में तेरे चेहरे का रंग बस मुझे देख कर बदलता है उसके साथ होने पर तेरे मन में मेरा कभी ख्याल भी नहीं संभलता है तो सच मान तेरा मन में बस मेरे लिए मलाल मचलता है अब तेरे रुह का किरदार उसकी बाहों में संभलता है ऐसा है जा तुझे खुद से आजाद किया मैंने मान लिया खुद को खुद से बर्बाद किया मैंने खुदा की कसम अब जो कभी तेरे लिए फ़रियाद किया मैंने रहम़ ना कर मुझ पर तेरे नये महबूब के लिए तेरा दिल आबाद किया मैंने ।