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आजाद

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 क्या तेरा चेहरा कभी उसकी बाहों में होकर मेरे लिए उतरता है या हर बात पर उसकी तेरा चेहरा बेवजह खिलता है और  अगर हकीकत में तेरे चेहरे का रंग बस मुझे देख कर बदलता है उसके साथ होने पर तेरे मन में मेरा कभी ख्याल भी नहीं संभलता है तो सच मान तेरा मन में बस मेरे लिए मलाल मचलता है अब तेरे रुह का किरदार उसकी बाहों में संभलता है ऐसा है  जा तुझे खुद से आजाद किया मैंने मान लिया खुद को खुद से बर्बाद किया मैंने खुदा की कसम अब जो कभी तेरे लिए फ़रियाद किया मैंने रहम़ ना कर मुझ पर तेरे नये महबूब के लिए तेरा दिल आबाद  किया मैंने ।

किरदार

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  मुझे देखकर वो रोता बहुत है  पर कुछ ही देर में चैन से सोता बहुत है  कहता है सुकून का जरिया हूं मैं उसके पर देखा है मैंने हजारों के साथ सुकून से होता बहुत है नहीं कहता मैं कि सबको चाहता वो है  पर औरों से अटखेलियां दिखाती हैं उसे चाहने वाले बहुत हैं हां  उन हजारों की भीड़ में मेरा भी एक किरदार -ए-वजूद था उसकी खातिर  मैं खुद को सबसे दूर कर बैठा मुझ पर इल्ज़ाम बहुत था और सुनो वो खुद को संभालने में माहिर इतना निकला जिसको जैसी जरुरत थी उससे वो वैसे मिला पर मैं इस कदर टूट गया मेरा ग़म सबके सामने यूं ही आंखों से बेवक्त छलक निकला  खता उसकी भी ना थी मजबूरियां खूब बताई थी उसने  मैं तो मान भी गया नादानियां मुझसे हुई जो इस दिल ने नजदिकियां बढ़ाईं थी उससे  पर ज़हन में एक सवाल हर वक्त गुंजता है कैसे कोई आंखों से देखे तभी एहसासों में पिघलता है ? ओझल हुआ नहीं कि चंद लम्हों में कैसे उसका रवैया बदलता है ? पूछो अगर तो कहता है, क्या करूं सबकी अपनी-अपनी जगह मैं मुकम्मल करता हूं  तुझे क्या पता है मैं किस तरह अपने आप को बदलता हूं फिर क्या  इन दो चार जवाबो...

# नज़र अंदाज़

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 चुभते हैं  ये छोटे छोटे तुम्हारे नज़रंदाज़ किए हुए पल  दिल बिखर जाता है दो टक में  हो जैसे कोई कांच का महल। बुद्धू सा है ये मन‌ आहट सुनते ही तुम्हारी भूल जाता है बीता कैसे वो कल न जाने कैसा होगा आने वाला वो  पल।

#दायरे

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 मुझे मेरे दायरों के मुताबिक जीना आता  है , तेरी खामोशियों से भी खुद के लिए वक्त को पिरोना आता है।  तू  बेरुखी से नजरें फेर ले तो क्या! तेरी दी हुई तन्हाइयों से भी समंदर को भिगोने आता है । वक्त मेरे लिए तेरे कहने से चलता है , वक्त मेरे लिए तेरे कहने से चलता है  फिर कभी कभी एहसास होता है वक्त बस मेरा नहीं सबका बदलता है।

#समय

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                       समय  कुछ सुना रहा है अनकही दास्तां चलने के लिए रास्तों को बदलना बता रहा है। खामोशी को आज पंख लगा कर  आसमान में नजरों से उड़ना सीखा रहा है । थके हुए इन सपनों को  दौड़ में जितने का एहसास दिला रहा है।

##हौसला

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वक्त मेरा मेरे साथ है ! कहता है सहने की  क्षमता तुझमें बेहिसाब है। चलते चलते रुकना नहीं , हिम्मत को अपने आप से बढ़ाना  कुछ कर गुजरने का हर वक्त खुद को एहसास दिलाना। किसी और को नहीं ,अपनी आवाज़ को खुद की पहचान बनाना कदम बढ़ते जाएंगे ,मंजिल तक पहुंचने का एहसास दिलाएंगे । संघर्षों  से क़ायम किए गए मुकाम , अपने आप से तुझको दुनिया से रुबरु कराएंगे , संयम है तो चल उन राहों पर वो खुद ब खुद तुझे खुल कर जीना सिखाएंगे।

#खामोशी#शोर

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#सपने#नज़र

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 जिंदगी के सफर में तुम अकेले चल रहे थे  हार गए तो क्या हुआ ,तुम फिर से संभल रहे हो। उम्मीद के डगर पर ख्वाब को संजो रहे थे बिखर गए तो क्या हुआ ,तुम फिर से उन्हें पिरो रहे हो। धड़कन तुम्हारी बढ़ रही थी देख रहे थे अरमान नये आंखें बंद हुई तो क्या हुआ ,तुम फिर से सपनों को जी रहे हो।  उठ रहा था उफ़ान सा तरंग भाव जो मन में दब गया तो क्या हुआ, तुम समीर बन अभी मचल रहे हो।

##अस्तित्व

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##एहसास

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##लक्ष्य और साथ

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एक कहानी जो शायद किसी ने न सुनी हो , कहानी जितनी दिलचस्प है उतनी ही विश्वशनीय । शुरुआत की थी मैंने अपने सपने को पाने की बदल रहा था सब कुछ मेरा अंजाने में , दिन को रात और रात को दिन करके मैं आगे बढ़ रही थी कि तब तक एक नई जिंदगी मुझसे जुड़ रही थी । बात उस दिन की है जब अचानक मां ने कहा कि अब तू बड़ी हो गई है घर की जिम्मेदारियां संभाल ले तो मैं भी निश्चिंत हो जाऊंगी । मां की बात मैं समझ गई थी उनका इशारा किसी दूसरी तरफ था। मैंने मां को समझाया 'मां मैं कोशिश कर रही हूं ' जल्दी ही कुछ न कुछ कर लूंगी। दिन बित रहे थे रातें नज़र नहीं आ रही थी बस बस एक उम्मीद ही थी जो बार बार दरवाजा खटखटा रही थी ।  मन मायूस हो जाता था ,जी और घबराता था, टूट न जाए ये हौसला निकलता हुआ वक्त बार बार एहसास दिलाता था । आखिरकार मां के सब्र का बांध टूट गया बोल पड़ी वो एक दिन नहीं हो पा रहा तो परेशान न हो मैंने तेरे भविष्य के लिए बहुत कुछ रखा है ताकि तुझे किसी चीज की कमी न हो अपना घर परिवार अच्छे से संभाल लेना बस । मां ने बातों ही बातों में फिर से किसी तरफ इशारा दिया ताकि मैं अब उनको उनकी जिम्मेदारियों से मुक्त कर ...

##हौसला है जनाब!

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  कर रहा कुछ खास ये वक्त है जनाब ! बदल रहे हैं हालात लग रहा है समय चल रहा है साथ । ख़ामोश होकर भी कह रहा है बेहिसाब ये शख्शियत है जनाब! बदल रहे हैं नजरिए लगता है मेहनत कर रहा है अपना काम। चलना, उठना, संभलना ये कदमों की चाल है जनाब ! बिना रूके पहुंच रहे हैं मंजिल के पास लगता है हौसला है बेहिसाब। तेज़, उमंग, तरंग, चमक तैर रही हैं ये आंखें हैं जनाब! हर तरफ रोशनी है लगता है क़िस्मत के सितारे भी हैं आस पास।  छोटा, बड़ा दिन रात के हिसाब से ये अपनी ही परछाई है जनाब! कोई उन रास्तों पर चलने जा रहा है कल आज में बदलने जा रहा है। चारो तरफ अपने हैं अपनो का है साथ ये सफलता है जनाब! वक्त बदल रहा है जिंदगी सही मायनों में चल रही है सब कुछ फिर से संभल रहा है ।  

##मुकाम##

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    खुद की पहचान हूं, कहो तो बस एक इंसान हूं। आसान है खुल के जीना ,कहो तो बस एक छोटी सी उड़ान हूं। समय के साथ चलना है, कहो तो बस सामंजस्य  का नाम हूं। आंखों में तेज़ है कुछ कर गुजरने का कहो तो बस अरमान हूं। पैर थक रहे हैं दूर चलकर जाना है कहो तो बस मुकाम हूं।

##उम्मीद

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##मंजिल ##सफलता

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  आंखों में जो मंजर है निखर कर जमीं पर उतरेगा अफसानों जैसा मेरा वजूद एक दिन हकीक़त बन कर संवरेगा । वक्त को जो आसार है परिवर्तन बन कर निखरेगा   फौलाद जैसा मेरा हौसला एक दिन नया इतिहास रचेगा ।

Success

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😊😊मां का संघर्ष 😊😊मेरी सफलता😊😊

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बेटी इधर सुनो , मां धीमी सी आवाज में पुकारती है । बेटी मां के पास जाकर पुछती है ,हां मां बोलो , मां कहती दो पल बैठ मेरे पास कुछ अपने काम के बारे में बता मुझे । मां काम बिल्कुल तुम्हारी तरह ही है जैसे तुम दिन रात मेहनत करके मेरे लिए हर चीज की व्यवस्था करती थी उसी तरह हमें भी मेहनत करके समाज के लिए हर चीज की व्यवस्था करनी होती है। मां थोड़ा घबरा गई सोच में पड़ गई क्या बेटी को भी उसी दौर से गुजरना पड़ता है उतनी ही मेहनत करनी पड़ती है ,क्या यही फल था मेरे संघर्ष का ? (मां के मन में उथल-पुथल चल रही थी ) । मां कुछ देर के लिए शांत हो गई ।  आयुषी बता रही थी पर मां के मन में दुखों का भूचाल आ गया था वो परेशान थी तो बस इस बात को लेकर कि क्या फायदा जो मेरी बेटी को भी वह कष्ट झेलने पड़ेंगे जिनसे मैं जुझती आई हूं। मां आयुषी की बातों पर बस सिर को हिला रही थी पर मनउसका  कठिनाइयों से जुझ रहा था । आयुषी मां को समझा कर जाने लगी पर मां ने न तो रोज की तरह उसकी तरफ देखा न ही वह आज कुछ बोली । आयुषी को यह बात कुछ अच्छी नहीं लगी मां कुछ बदली बदली सी थी। देर शाम जब आयुषी घर वापस आई मां अभी भी कुछ खोई ख...

##सफलता जीवन का मूल उद्देश्य

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  कुछ कर तू, न डर तू, सबेरा होगा वक्त जरूर बदलेगा। समय है चलेगा दिन है तो ढलेगा  पर रूकना है नहीं, एक दिन तू जरूर संभलेगा। शूल हैं रास्तों में पथ रोकेंगे ही कहीं पर थमना  है नहीं, प्रतिदिन फूल की तरह खिलना है सही। अज्ञानता शिश उठा के अधर्म से जोड़ेगा कभी  पर झुकना है नहीं, कर्त्तव्य आप आप से करेंगे सभी। विमुख हुई परिस्थितियां हौसला तोड़ेगी ही कभी न कभी पर टूटना  है नहीं, प्रकाश की तरह खुद को बिखेरना है कहीं न कहीं। मुश्किलों के चक्रव्यूह में उलझना है कभी पर साथ छोड़ना है नहीं, काल चक्र को मोडना है सही। भय है लगेगा, हृदय और तेज़ चलेगा पर सांसों को रोकना है नहीं, पग को पथ पर आगे बढ़ाना है सही ।  अंधकार छाया है, हर पल धुंधला है अभी पर आंखों को बंद करना है नहीं, पलकें झुका कर हमारा आगे चलना है सही।  विफलता का मंच है, परिवर्तन अनंत है  पर धैर्य को खोना है नहीं, विश्व के इस पटल पर अवसर जीवनपर्यंत है। निराशा है टूटने का एहसास है पर अथक प्रयास रोकना है नहीं,  विश्वास कर प्रसंग पर लक्ष्य तक तू स्वयं के संग है । डगमगा रहे कदम, अधर में  है जैसे जीव...

#उम्मीद थी उसकी आंखों में ! # इंतजार था उसके आने का ! ।

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कहानी है एक छोटे-से गांव की उस गांव में सरला देवी अपने बेटे के साथ रहती थी। सरला देवी ने अपने बेटे को बड़  लाड से पाला था मानो तो सरला जी की दुनिया उनके बेटे से शुरू और उस पर ही ख़त्म हो जाती थी। दोनों खुश ‌रहते थे बेटा सरस भी मेहनत करता था घर खर्च भी चलाता  था पर उसकी एक आदत खराब थी वह जो भी कमाता था उसमें से घर का खर्च निकालने के बाद कुछ भी नहीं बचाया करता था। वह सारे पैसे न जाने क्या करता था। सरला देवी सरस की शादी करवाने का सोचने लगी , बात करते करते उन्हें एक अच्छी लड़की भी मिल गई । सरला जी ने सरस की शादी बड़े धूम-धाम से करवाई ।बहू घर आई समय‌‌ बीतने लगा। कुछ महीनों बाद जब बहू सरस की आदतों को जानने लगी तो वो सरला जी से कहने लगी वो सारी बातें जो सरला जी पहले से ही जानती थीं पर उन्होंने ने सरस के खिलाफ बहू से कुछ नहीं कहा। सरस दिन प्रतिदिन और बिगड़ता गया लेकिन सरला जी ने कभी उसे उसकी गलतियों को सुधारने के लिए कभी नहीं कहा और सरस अपनी पत्नी की बातें सुनकर भी अनसुना कर देता था। सरला जी अब सरस की पत्नी से नाराज़ रहने लगी क्योंकि वह सरस को सुधार नहीं पा रही थी। एक दिन सरस काम से घ...

#मुझे खुद के लिए नहीं तेरे लिए जीना था # मां के दिल की बात। । # संघर्ष

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मुझे खुद के लिए नहीं तेरे लिए जीना था , मां अपनी बेटी से आज कहती है जब बिटिया के सारे दोस्त अपने अपने घर को चले जाते हैं जन्मदिन की बधाईयां देकर। आज बिटिया १८ वर्ष की हो गई है।मां अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहती है अब तू बड़ी हो गई है ,तू मुझसे भी अधिक समझदार है। आज तक मेरे पास जो भी था वो सब मैं खुशी खुशी देती रही आगे भी देती रहूंगी । आज का दिन तुम्हारे लिए खास है आज तुमको क्या चाहिए बताओ, बिटिया खुश हो कर बोल पड़ी मां मुझे भी स्कूटी चाहिए दिला दो न । मां अन्दर से टूट गई पर चेहरे पर एक अच्छी सी मुस्कान लाकर बोली हां जल्दी ही दिला दूंगी तू बस अच्छे से मन लगाकर पढ़ना और बड़ अफ़सर बनना। बिटिया ने सर हिलाया और हामी भरते हुए बोली हां मां मैं खुब मन लगा कर पढूंगी। मां जब भी काम करती सोचती रहती इस काम से पैसे कम मिल रहे हैं ऐसा क्या करूं कि स्कूटी के लिए पैसे इकट्ठे हो जाएं ,वह सोचती अगर रखे हुए पैसे से स्कूटी ले लेती हूं तो बीटिया को बाहर पढ़ने कैसे भेजूंगी। मां हर वक्त खोई खोई सी रहने लगी उसे बुलाने पर सुनती भी न थी। एक दिन जब बैठे बैठे  मां को काम करते हुए कुछ न सूझा तो मां ने निर्णय ...