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#उम्मीद थी उसकी आंखों में ! # इंतजार था उसके आने का ! ।
कहानी है एक छोटे-से गांव की उस गांव में सरला देवी अपने बेटे के साथ रहती थी। सरला देवी ने अपने बेटे को बड़ लाड से पाला था मानो तो सरला जी की दुनिया उनके बेटे से शुरू और उस पर ही ख़त्म हो जाती थी।
दोनों खुश रहते थे बेटा सरस भी मेहनत करता था घर खर्च भी चलाता था पर उसकी एक आदत खराब थी वह जो भी कमाता था उसमें से घर का खर्च निकालने के बाद कुछ भी नहीं बचाया करता था। वह सारे पैसे न जाने क्या करता था।
सरला देवी सरस की शादी करवाने का सोचने लगी , बात करते करते उन्हें एक अच्छी लड़की भी मिल गई । सरला जी ने सरस की शादी बड़े धूम-धाम से करवाई ।बहू घर आई समय बीतने लगा। कुछ महीनों बाद जब बहू सरस की आदतों को जानने लगी तो वो सरला जी से कहने लगी वो सारी बातें जो सरला जी पहले से ही जानती थीं पर उन्होंने ने सरस के खिलाफ बहू से कुछ नहीं कहा।
सरस दिन प्रतिदिन और बिगड़ता गया लेकिन सरला जी ने कभी उसे उसकी गलतियों को सुधारने के लिए कभी नहीं कहा और सरस अपनी पत्नी की बातें सुनकर भी अनसुना कर देता था। सरला जी अब सरस की पत्नी से नाराज़ रहने लगी क्योंकि वह सरस को सुधार नहीं पा रही थी। एक दिन सरस काम से घर वापस नहीं आया , उसका कुछ भी पता नहीं चल पा रहा था । सरला जी और 'कुसुम' सरस की पत्नी दोनों बहुत परेशान हो रहे थे ।सालों बीत गए सरस का कुछ पता ना चला ।
#उम्मीद थी मां की आंखों में , इंतजार था उसके आने का ।
घर के हालात कुछ बिगड़ से गए थे कुसुम ने अब घर चलाने की जिम्मेदारी अपने सर पर उठा रखी थी ।वह शहर में जाकर रहने लगी सरला जी को भी अपने साथ ले गई लेकिन सरला जी को बहू के साथ अच्छा नहीं लगता था ,वह बार बार गांव चली जाती थीं।
लगभग चार - पांच साल बाद सरस अचानक कुसुम के पास आ पहुंचा । कुसुम सरस को देख कर समझ नहीं पा रही थी कि सरस से क्या पूछें और क्या नहीं ।सरस कुसुम के साथ ही रहने लगा। कुसुम ने एक दिन सरस से कहा तुम गांव जाकर मां को गांव से लेकर आओ ।
सरस दिन भर इधर-उधर करता और कुसुम की बातों को टालते रहा। कुसुम समय समय पर सरला जी से मिलने जाया करती थी ,पर सरला जी की जबान पर हर वक्त सरस का नाम होता था वह कहती थी "वो आया था मुझसे मिलकर गया है"। अब तो सरला जी अपने होशोहवास में भी नहीं रहती थीं उनकी तबीयत भी खराब रहने लगी थी। कुसुम उनसे हर बार साथ चलने को कहती थी पर वो मना कर देती थीं। कुसुम देख पा रही थी उनकी आंखों में।
#अभी भी उम्मीद थी उनकी आंखों में! इंतजार था उसके आने का !
कुसुम बार बार कोशिश करती कि सरस एक बार गांव जाकर मां को देख आए पर वो हर बार सिर हिला कर चला जाता। कुसुम सरला जी की उम्मीद को टूटने नहीं देना चाहती थी वो उनके इंतजार को खत्म करना चाहती थी।अंत में कुसुम सरला जी को डाक्टर को दिखाने का बहाना करके घर ले आई।
#सरला जी चुपचाप सरस को देख रही थी, अपनी उम्मीदों को जी रही थीं। इंतजार उनका खत्म हो रहा था वो अब सुकून की नींद सो रही थीं।
##हर बार अगर हम अपनों में नहीं दूसरों में कमी देखते हैं तो यह अपनों का हित नहीं अहित दर्शाता है अर्थात हमें पहले अपने में अपनों में स्वयं सुधार लाना चाहिए तत्पश्चात दूसरों को दोष देना चाहिए।
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