Today's life

  जीवन और मशीन   


आज की जिंदगी मशीन की तरह है , शुरू में एक्सट्रा वर्क करती है धीरे-धीरे आगे चल कर थोड़ी खराबी आती है तो तेल या ग्रीस की तरह दवाएं लेकर हम फिर चल पड़ते हैं।
आखिर में जब मशीन खराब होने लगती है तो जिंदगी का आखिरी पड़ाव आ जाता है। फिर हम दवाओं पर भी नहीं चल पाते हैं।
यह किसी एक व्यक्ति की बात नहीं है ,इस मोड़ से सभी गुजरते हैं पर फिर भी सब आखिरी पड़ाव पर साथ नहीं देना चाहते हैं।

मशीन से जब तक कुछ लाभ होता है सब उस से काम लेते हैं और अंत समय में उसको बुरा भला भी कहते हैं । इसी प्रकार आज का मनुष्य भी होता चला जा रहा है। अपनी जिम्मेदारियों को निभाने की जगह खुद के लाभ हानि के विषय  में अधिक सोच रहा है।


हम न तो जीवन दे सकते हैं न ही ले सकते हैं पर दूसरों को कुछ गलत करता देख अफसोस करने और उनसे घृणा करने की जगह उस गलत काम को कभी खुद न करने तथा अपने परिवार के सदस्यों को भी न करने देने से बचा सकते हैं।

जिस प्रकार मशीनों में भाव नहीं होता वैसे ही मनुष्य जीवन में बिना भाव  के चलता जा रहा है। कार्य क्षेत्र में तरक्की पाना अपनी सुख सुविधा बढ़ाना एक मात्र लक्ष्य रह गया है। सामाजिक शब्द का अर्थ समाप्त हो रहा है।
ऐसा लग रहा है मनुष्य जीवन नहीं व्यवसाय कर रहा है।खुल कर हंसने और दूसरों से मिलने में क्या लाभ है यह आज कल का मुख्य विचार है।


अब तो बचपन से भी कल पुर्जों को सही किया जा रहा है ,अच्छे से पढ़ो ,बार बार लिखो, ध्यान लगाओ नहीं तो कम्पटीशन में पीछे रह जाओगे, तो फिर नई मशीन कैसे बनाओगे ।समय से उठो समय से काम करो अपनी काम करने की क्षमता को बढ़ाओं,
 तो ही तो जीवन को सफल बनाओगे।


बच्चों को कभी ये टेस्ट कभी वो टेस्ट दिलाना उसके बाद मशीन में क्या क्या कमी है खोज निकालना, फिर बैठ कर उसको सही करना ,एक और अच्छी मशीन तैयार करना।


आज समाज में आगे निकलने की होड़ है, सब एक दूसरे से आगे निकलने में परेशान हैं, कोई भी एक मिनट का समय बर्बाद नहीं करना चाहता है। आज किसी की बात सुनना समझना बेकार सा लगने लगा है।सब खुद को साबित करने में लगे हैं।


इन सब बातों को करते हुए हम भूल गए हैं कि हम खुश रह सकते हैं कुछ दूसरों के गम को बांट कर ।हम जी सकते हैं एक कदम पीछे हट कर।हम सोच सकते हैं उनके बारे में जिनकी खुशियां हमसे हैं।हम समय निकाल सकते हैं साथ खेल कर दिल बहलाने के लिए ।हम महसूस कर सकते हैं अपनी भावनाओं को ।हम कह सकते हैं अपने विचारों को ।


जीवन में बदलाव करना पड़ेगा हमें मशीन की तरह नहीं मनुष्य की तरह घर से निकालना होगा। सोचना होगा अपने और अपनों के बारे में , हमको समाजिक बन कर ढलना होगा । वक्त रहते ही हमको संभलना होगा।


अपने आप को बदलना होगा हमको मशीनों की तरह नहीं इंसानों की तरह चलना होगा।


अपने साथ साथ सबको लेकर चलना होगा ,हमें अभी थोड़ा और संभलना होगा।
 जीवन की सच्चाई को अपनी अच्छाई को लेकर चलना होगा , हमें अभी थोड़ा और संभलना होगा।

हमको मशीन की तरह नहीं इंसान की तरह  संभलना होगा।


टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें