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मई, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

अंदाजा

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  जाते-जाते वो मुझसे अब बार बार कहती है  तुम्हारी आंखें इतना बरसती हैं पता नहीं था तब  मैं सोचता हूं क्या सच में मुझे भी पता नहीं था  वो इतना जो जताता था "क्या बस दिखाता था?"  मुझे बिल्कुल अंदाजा नहीं था वो इतने हिम्मतवार होंगे टूटता देखकर भी मुझे ऐसे सवालों के तलबगार होंगे अब  अफसोस होता है मुझे उन लम्हों पर  जिसमें मैं खुद को कोसता रहता था ना जाने कितने रुमाल आज भिगे होंगे  ना जाने कितने अरमान आज टूटे होंगे मेरी वजह से वो आज मुझसे रुठे होंगे!

आखिरी मुलाकात

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 आखिरी मुलाकात में मैंने मांगा तो था नहीं कुछ, ना तेरे पास आये थे ,मुझे पता था अपना दायरा, ना तुझे मिटाने के लिए मजबूर कराये थे पर तेरी उस बात ने बीते लम्हों का सब कुछ मिटा दिया बात बहुत बड़ी नहीं थी पर एक पल में ही गैर होने का एहसास दिला दिया ऐसा था नहीं की मैं तुमको छू देता और रही बात देखने की तो मैं क्या शायद घर के और भी लोग तुझे वैसे कभी न कभी देख लेंगे शायद मेरी नज़रों पर तुमको भरोसा नहीं था तुमको शक था कहीं नजरें मेरी दगा ना कर जाएं पर मुझे मेरे कायदे पता हैं, "अगर तुमने ना बोला है" तो अपने दायरे पता हैं चलो कोई नहीं मुझे मेरे दायरे समझाने के लिए ,मुझे मेरी हदें बताने के लिए तुम्हारा शुक्रिया पल भर में ही ऊंचाई से नीचे गिराने के लिए शुक्रिया शायद अब मुलाकात ना हो तुम रहो खुश अपनी दुनिया में खुदा करे जल्द ही वो दिन भी आए जब हमारी कभी बात ना हो 

आजाद

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 क्या तेरा चेहरा कभी उसकी बाहों में होकर मेरे लिए उतरता है या हर बात पर उसकी तेरा चेहरा बेवजह खिलता है और  अगर हकीकत में तेरे चेहरे का रंग बस मुझे देख कर बदलता है उसके साथ होने पर तेरे मन में मेरा कभी ख्याल भी नहीं संभलता है तो सच मान तेरा मन में बस मेरे लिए मलाल मचलता है अब तेरे रुह का किरदार उसकी बाहों में संभलता है ऐसा है  जा तुझे खुद से आजाद किया मैंने मान लिया खुद को खुद से बर्बाद किया मैंने खुदा की कसम अब जो कभी तेरे लिए फ़रियाद किया मैंने रहम़ ना कर मुझ पर तेरे नये महबूब के लिए तेरा दिल आबाद  किया मैंने ।

किरदार

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  मुझे देखकर वो रोता बहुत है  पर कुछ ही देर में चैन से सोता बहुत है  कहता है सुकून का जरिया हूं मैं उसके पर देखा है मैंने हजारों के साथ सुकून से होता बहुत है नहीं कहता मैं कि सबको चाहता वो है  पर औरों से अटखेलियां दिखाती हैं उसे चाहने वाले बहुत हैं हां  उन हजारों की भीड़ में मेरा भी एक किरदार -ए-वजूद था उसकी खातिर  मैं खुद को सबसे दूर कर बैठा मुझ पर इल्ज़ाम बहुत था और सुनो वो खुद को संभालने में माहिर इतना निकला जिसको जैसी जरुरत थी उससे वो वैसे मिला पर मैं इस कदर टूट गया मेरा ग़म सबके सामने यूं ही आंखों से बेवक्त छलक निकला  खता उसकी भी ना थी मजबूरियां खूब बताई थी उसने  मैं तो मान भी गया नादानियां मुझसे हुई जो इस दिल ने नजदिकियां बढ़ाईं थी उससे  पर ज़हन में एक सवाल हर वक्त गुंजता है कैसे कोई आंखों से देखे तभी एहसासों में पिघलता है ? ओझल हुआ नहीं कि चंद लम्हों में कैसे उसका रवैया बदलता है ? पूछो अगर तो कहता है, क्या करूं सबकी अपनी-अपनी जगह मैं मुकम्मल करता हूं  तुझे क्या पता है मैं किस तरह अपने आप को बदलता हूं फिर क्या  इन दो चार जवाबो...