#ख़ता

ख़ता तुम्हारी कहां वक्त तो मेरा बदल रहा है !
कोशिश मैं कर रहा हूं कश्मकश को मिटाने की
बीती बातों को शब्दों में जताने की।
'मन 'अंदर से खुद को मना रहा है सही ग़लत के मायने सिखा रहा है
तुम्हारी यादें तो ज़हन से ना जा पायेंगी
ख्वाहिश है! अब कभी आंखें ना फिर तुमसे टकराएंगी ।
क्या पता ये दिल फिर खुद को मना ना पाए
तू नज़र आए तो नज़र अंदाज़ करने की कीमत चूका ना पाए।
सच को परछाईं बनाउंगा तेरे दिए हुए सबक जल्द सीख जाउंगा
ख़ता एक छोटी सी मैं भी कर जाउंगा जिंदगी को वक्त बदलने के मोड़ पर ले आऊंगा।
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