शिकायतें बहुत हैं तुमसे , पर मेरी कवायदें भी तुम्हीं हो । मैं रूठ जाऊं तुमसे, पर मेरे दायरे भी तुम्हीं हो । रियायतें बख्शीं हैं तुमने , पर किसी और के लिए । आदतें भी बदल ली हैं तुमने, पर किसी और के लिए । ...
कम्बख़त जज़्बात ऐसे हैं कि , एहसास ना होने की कभी खता नहीं करते। तू है मेरे मुकद्दर में ख़ुदा के नायाब तोहफ़े की तरह, बस हम कभी लफ़्ज़ों में इसे बयां नहीं करते।