किरदार
मुझे देखकर वो रोता बहुत है
पर कुछ ही देर में चैन से सोता बहुत है
कहता है सुकून का जरिया हूं मैं उसके
पर देखा है मैंने
हजारों के साथ सुकून से होता बहुत है
नहीं कहता मैं कि सबको चाहता वो है
पर
औरों से अटखेलियां दिखाती हैं उसे चाहने वाले बहुत हैं
हां
उन हजारों की भीड़ में मेरा भी एक किरदार -ए-वजूद था
उसकी खातिर
मैं खुद को सबसे दूर कर बैठा मुझ पर इल्ज़ाम बहुत था
और सुनो
वो खुद को संभालने में माहिर इतना निकला जिसको जैसी जरुरत थी उससे वो वैसे मिला
पर मैं इस कदर टूट गया मेरा ग़म सबके सामने यूं ही आंखों से बेवक्त छलक निकला
खता उसकी भी ना थी मजबूरियां खूब बताई थी उसने
मैं तो मान भी गया नादानियां मुझसे हुई जो इस दिल ने नजदिकियां बढ़ाईं थी उससे
पर ज़हन में एक सवाल हर वक्त गुंजता है
कैसे कोई आंखों से देखे तभी एहसासों में पिघलता है ?
ओझल हुआ नहीं कि चंद लम्हों में कैसे उसका रवैया बदलता है ?
पूछो अगर तो कहता है, क्या करूं सबकी अपनी-अपनी जगह मैं मुकम्मल करता हूं
तुझे क्या पता है मैं किस तरह अपने आप को बदलता हूं
फिर क्या
इन दो चार जवाबों से फिर इल्ज़ाम मेरे साथ ही चलता है
मैं ही समझ नहीं पा रहा "वो हां वो" किस मुश्किल दौर से
रोज़ निकलता है।

,,😶
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