#लम्हें
![]() |
| बीते लम्हें! |
खामोशी तेरी कुछ चूभ सी जाती है, बेवजह तू हर वक़्त सताती है ।
निकाल दू तुझे ख़ुद के जहान से, मेरी ख़ामोशियां हर वक़्त यही सोरी मचाती हैं ।
शख्सियत तेरी खूब थी जो ना चाहते हुए भी अपने होने का अहसास दिलाती हैं।
चाहूं मैं रूखसत होना तेरी उन यादों से , फिर भी आईना की तरह तेरी झलक आंखों में उतर आती है ।
खामोशी तेरी कुछ चूभ सी जाती है, बेवजह तू हर वक़्त सताती है ।

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें