बिखरे हुए पल
मैं खुद में इतना उलझ गयी हूं कि सवाल भी सहम जाते हैं।
क्या ! बात अपनों से जुड़ी है, ये हालात भी कुछ भरम खाते हैैं ।
कुछ कहूं तो माखौल उड़ाते हैं, मुझे मुझ पर ही शर्मिंदा कराते हैं।
संघर्ष कर रहे मस्तिष्क को अब दिन के उजालों, रात के अंधेरों में कम फ़र्क नज़र आते हैं।
जीवन की डोर जो कमजोर हाथों में हो तो अब अबस भी उंगली उठाते हैं ।
रहकर भी! गुम हूं ,जैसे धड़कन चल तो रही हैं, पर नब्ज़ थम सी गयी है।
टूट गया है हर ज़र्रा ज़र्रा मेरी शख्सियत का, इक्ट्ठा करूं तो क्या! जो अधर में है अब बचा ?
ख्वाब मेरे छोटे छोटे से थे , इतनी बार टूटे कि आंखों ने भी बंद होने से इंकार कर दिया।
गलत था साथ मेरा या गलत इसे बदलते हालात ने कर दिया।
उम्मीद नहीं रही मुझे , फिर से वो मंज़र आयेंगे ,
कोई होगा जो मेरा अपना कहलायेगा।
अब बिखर कर ही रहने में ,खुद को समेट लिया है मैंने
औरों पर नहीं,खुद पर आखेट किया है मैंने।

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