खामोशी से गुफ्तगू करते हुए किरदार जिंदगी का निभा रहे हैं,
बेख़ौफ़ निकल पड़े हैं उन रास्तों पर जहां सिसकियां बादल बनकर छा रहे हैं।
अपने तराजू लिए खड़े हैं, कसौटी पर खरे उतरे की नहीं गैर माखौल उड़ा रहे हैं ,
जिम्मेदारियों के बोझ से , 'जीवन' आंखें बंद कर रंजिशो से अब जी चुरा रहा है ,
पर थककर हार जाना , खुद को खुद से यूं बेरंग दिखाना इतना आसान कहां?
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