बदलता वक्त


बदल गया वो दौर बदल गया वो जमाना जब वो कहा करते थे 'तुम ' घर के बाहर रात में मत जाना।
आज तो हम कन्धे से कन्धा मिलाकर चलते है , नया वक्त बनाते हैं लिखते हैं नया अफसाना।
क्या होगा पढ़-लिख कर तुम को तो एक घर से दूसरे घर है बस जाना,बे वजह  वक्त क्यो गवाना।
कह रहे हैं 'हम' भी अब वही तराना , ये दुनिया सिख रही है हमसे घर और आत्मसम्मान साथ चलाना।
खुद तक सिमट कर रहो ,क्या हक है तुम्हारा मेरी बातों को  काट कर यू खुद का मत बताना।
आज घर हमारा सारी उलझनो के हल हमसे ही पाना , वक्त के बदने का खुबसूरत बहाना।
दुनिया कितनी भी आगे निकल जाए तूमको बस काम-काज में जीवन है बिताना ,गहना है शर्म इसे कभी न भूलाना।
आज काम करते-करते चांद की पैरवी कर आए हम , गहने को सम्भाल कर रखा बस सोच बदल लाए हम ।
हम थे वहीं उस ख्वाब में जो सजा कर निकले अपने मां के आंचल से टूट जाता था पल-पल वो आग की लपटों में।
संग है तुम्हारा आज हर छंदों में ,तुम साथ चल रहे हो मुझमें हर सफ़र के लम्हों में।
वक्त के साथ वक्त बदलता है, खुबसूरत लम्हों में वो पलता है।
                               ✌


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