##लक्ष्य और साथ








एक कहानी जो शायद किसी ने न सुनी हो , कहानी जितनी दिलचस्प है उतनी ही विश्वशनीय ।


शुरुआत की थी मैंने अपने सपने को पाने की बदल रहा था सब कुछ मेरा अंजाने में , दिन को रात और रात को दिन करके मैं आगे बढ़ रही थी कि तब तक एक नई जिंदगी मुझसे जुड़ रही थी ।
बात उस दिन की है जब अचानक मां ने कहा कि अब तू बड़ी हो गई है घर की जिम्मेदारियां संभाल ले तो मैं भी निश्चिंत हो जाऊंगी ।
मां की बात मैं समझ गई थी उनका इशारा किसी दूसरी तरफ था।
मैंने मां को समझाया 'मां मैं कोशिश कर रही हूं ' जल्दी ही कुछ न कुछ कर लूंगी।

दिन बित रहे थे रातें नज़र नहीं आ रही थी बस बस एक उम्मीद ही थी जो बार बार दरवाजा खटखटा रही थी ।

 मन मायूस हो जाता था ,जी और घबराता था, टूट न जाए ये हौसला निकलता हुआ वक्त बार बार एहसास दिलाता था ।

आखिरकार मां के सब्र का बांध टूट गया बोल पड़ी वो एक दिन नहीं हो पा रहा तो परेशान न हो मैंने तेरे भविष्य के लिए बहुत कुछ रखा है ताकि तुझे किसी चीज की कमी न हो अपना घर परिवार अच्छे से संभाल लेना बस ।
मां ने बातों ही बातों में फिर से किसी तरफ इशारा दिया ताकि मैं अब उनको उनकी जिम्मेदारियों से मुक्त कर दूं ।  मां हारी नहीं थी पर थक गई थीं जिम्मेदारियां निभाते निभाते । मां अभी बात को आगे बढ़ती ही कि मैंने उनसे कहा कि 'मां मुझे बस एक साल का समय और दे दीजिए ' उसके बाद आप जो भी कहेगी मैं कर लूंगी। मां ने हामी भरते हुए सिर को हिलाया ।
मां से तो मैंने समय मांग लिया पर अंदर जो सैलाब उठा उसे रोकना मुश्किल लग रहा था । डर क्या होता है उस वक्त समझ आया ,वो डर जो अपने लिए गए निर्णय से लग रहा हो कुछ देर तक मेरे हाथ, पैर, यहां तक की मैं खुद पुरी तरस से हिल रही हूं। जब मां चली गई तो मैंने खुद को समझाना शुरू किया कि मैं कर लूंगी कर सकती हूं ।

पल पल जैसे पिघल रहा था, अस्तित्व मेरा जैसे मेरे हाथों से फिसल रहा था ।

आंखें मेरी थम सी गई थी जैसे नजरों के सामने से मंजिल निकल रहा था।

सोच में धड़कन तेज धड़क रही थी, मन था वो हवा से भी तेज मचल रहा था।

अंदर ऐसी हलचल थी जैसे कोई बवंडर सांसों से नब्ज़ों तक  चल रहा था।

मैंने खुद को समझाना शुरू किया कुछ देर खुद से कहती रही मैं कर लूंगी मैं कर के रहूंगी ,मेरा मन शांत हो ही रहा था कि तब तक मां फिर से आ गई , इस बार मां ने कुछ और ही कहा 'तू कर कोशिश मैं तेरे साथ हूं ' । अचानक इस बात को कहने से मुझे खुशी तो बहुत हुई पर मैं सोच में पड़ गई ऐसा क्या हुआ जो मां का मन बदल गया । मां से इस परिवर्तन के बारे में पुछने की हिम्मत तो न थी सो मैंने भी मां को गले लगा के उनको धन्यवाद किया । मां के साथ साथ मैंने खुद से भी वादा किया कि अब तो जीत के दिखाऊंगी। मन में एक नई उम्मीद जगी मैं फिर से अपने सपने के राह पर चली ।

बेख़ौफ़ उड़ान भरी आंखों ने, बेबाक आगे चली मन में कुछ वादे लेकर।

गुज़ारिश की संभलने की इरादों ने, बेइंतहा असर हुआ तय किया मैंने सफ़र  चमकते सितारे लेकर।

अब मैंने अपनी कोशिश के साथ-साथ मां के विश्वास को साथ लेकर कर आगे बढ़ रही थी , मां हर बार आकर कह जाती तू कोशिश कर मैं तेरे साथ हूं। इस बात से ही मुझे इतनी ताकत मिलती कि मैं सारी थकान भूलकर फिर से लग जाती थी ।
आखिरकार वो दिन आ ही गया था जब मेरा परिणाम आने वाला था फिर से वही डर जो सपनों को छोड़ने की बात को सुनकर लगता था सामने आ जा रहा था , मां बार बार कह रही थी परेशान न हो रिजल्ट अच्छा आयेगा और जो न भी आया तो अभी और समय है फिर से कोशिश करना 'मैं तेरे साथ हूं' पर सांसें ऊपर नीचे हो रही थी धड़कन और तेज़ हो रही थी  लग रहा था जैसे एक घंटे का समय एक साल में बित रहा हो जैसे तैसे समय बिता रिजल्ट आ गया ।
मैं जहां खड़ी थी वहीं बैठ गई जैसे मेरे अंदर जान ही न बची हो मां बार बार पुछ रही थी क्या हुआ कुछ तो बोल अगर नहीं हुआ तो भी कोई बात नहीं अगली साल फिर से कोशिश करना जरूर हो जाएगा । मेरी आंखों से बस आंसू निकल रहे थे मैं बोलना चाहती थी पर आवाज ही नहीं निकल रही थी ,थक के मां भी मेरे पास बैठ गई धीरे-धीरे मुझे समझा रही थी मेरे सिर को सहला रही थी । मन में मेरे उस समय कुछ ऐसा था -

उम्मीद की डगर पर लंबा सफर था , मुश्किलों से जूझ रहा तकदीर बेअसर था ।

सालों साल से कुछ नहीं बदल रहा था ,आज जगमगा गई किरण हौसलों की वक्त मेरा बदल रहा था।

जब मेरे अंदर थोड़ी स्थिरता आई तब जाकर मैंने मां के हाथों को पकड़ कर कहा 'मां परिणाम बहुत अच्छा आया है'। मां बहुत खुश हुई और बोली मुझसे अधिक उसे पता था कि तू कर लेगी ! मुझे बात कुछ समझ न आई मैं सोच रही थी परिवार में बस मैं और मां हूं तो ये 'उसे'  कौन है ?
आखिरकार मैंने हिम्मत जुटा के मां से पूछा कि मां किस को मुझ पर आप से अधिक भरोसा था?
मां मुस्कुराते हुए बोली जिसके घर की जिम्मेदारियां मैं तुम्हें संभालने के लिए कह रही थी । जब तुमने मुझसे एक साल का समय मांगा तो मैंने उस लड़के से बात की उसने कहा 'आप परेशान न हों मुझे पता है वो कर लेगी और आप एक साल का समय नहीं उसे जितने साल का समय चाहिए दे दिजिए और उसके साथ चलिए हर वक्त ' जब उसकी ये बातें मैंने सुनी तो मुझे भी लगा मुझे तुम्हारे उपर भरोसा होना चाहिए इसलिए मैंने उस दिन ही निर्णय कर लिया कि कितना भी समय लगे मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहूंगी ।
ये सारी बातें सुनकर मैंने मां को गले लगा लिया और मेरे साथ रहने के लिए उनका धन्यवाद किया ।
 

ख़ामोशी कभी कभी कमाल कर जाती है अपने आप से ही सवाल जवाब कर जाती है ।

विश्वास की डोर मजबूत हो तो अनदेखे सहारे से भी इस पार से उस पार ले जाती है ।










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