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  तेरी तरबियत से नवाजू खुद को तेरा होकर खुद दिखा दूं तुझको क्या हक दोगी मुझे ? तेरे सारे आरज़ू खुद से मुकम्मल करुंगा कहने से पहले मैं तुझमें कुछ इस तरह ढलूंगा तुम मुझ में ऐसे शामिल थे मुझे लगा तुम मुझे हासिल थे मुझे इल्म था हम तेरे काबिल थे तुझे कहने वाले हम ही ग़ालिब थे पर कहते हैं ! मन की मर्जियां खुद और खुदा जानता है देखने वाला तो तुझे और तेरा कहा जानता है मैं तुझे हकीकत मान तेरे किए हुए वादे जानता था मुझे क्या पता था तू बस दगा के इरादे जानता था । आज भी ख़ुदा के दर पर तेरी सदाएं (आवाज)मांगता हूं तू नहीं है मेरी तो भी तेरी की हुई वफाएं जानता हूं मैं नहीं कहता कि मुझे खौफ तेरे जाने का ना हुआ था देखा तुझे उसका होते, मेरा शरीर पत्थर सा जमा हुआ था अगर बिछड़ जाए महबूब ,लोग कहते हैं बद्दुआएं देता हूं जाओ मैं बहते हुए अश्कों के साथ भी तुम्हें दुआएं देता हूं

ख्वाहिश

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 मैं चाहता हूं बड़ी शिद्दत से चाहे उसे उसका महबूब हाथ थामे बैठे और सरगोशियां करें खूब बेखबर आंखें खूबसूरत नज़ारे देखें बेफिजूल उसकी मुस्कान ही अहम हो ऐसा बनाए उसूल मैं सोचता हूं! अगर मैं देख सकूं तो उसकी पूरी तस्वीर दिखाना  गुम हो इश्क़ ए ख्वाब में ऐसी उसकी तकदीर बनाना उससे जुदाई के अंजाम ए सफ़र पर बस मुझे चलाना  मुझे खुद की रंजिशों का रंग खुद पर ही है चढ़ाना मैं बयान करता हूं! एतबार ए वफ़ा की थी अब बद्दुआओं में कैसे रखूंगा  मेरा ना हुआ तो क्या हुआ अब भी मैं उस पर मरुंगा हां अब नहीं कह सकता मैं कि मेरे दर्द की गहराई कम है देख उसे उसके महबूब के साथ मेरी खुद से लड़ाई कम है पर अब भी  मैं खुद से रूठ जाता हूं ! अगर किसी कहे गए मेरे लफ़्ज़ों में उसकी भलाई कम है  मैं खुद को रोक कहता हूं ! ऐ ख़ुदा !अश्कों के साथ कहे इन शब्दों में सच्चाई कम है।  

इंतज़ार

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  सुनो  मुझे पता है अब भी तुम बहाने नहीं बनाती अरे तुम तो मुझे पल पल का हिसाब हो दिखाती अब थोड़ा वो मेरे लिए पागलपन कम हो गया है बस जो सब कुछ मुझे बताती वो ख़तम हो गया है सोचते हुए अब सुबह से शाम तुम्हारे इंतज़ार में जाता है बेसक फिर तुम्हारा समय तुम्हारे ख्वाब में बीत जाता है झलक  तुम आज भी मुझे दिखाना नहीं भूलती  जताती हो तुम मेरी उलझनें मिटाना नहीं भूलती  चलो सब कुछ मैं सही मानता हूं पर इस वक्त को भी मैं बखुबी जानता हूं  फिर से वो दौर आएगा  उतना ही तुम्हारे मन को वो भाएगा तुम में बेताबी वैसी ही होगी  और शायद उसके लिए समय की आजादी होगी  फिर तुमको कामों में व्यस्तता ना रहेगी  निगाहें पल भर भी दूरी ना सहेंगी तुम इस कदर बेताब रहोगी  उससे अपनी सारी चाहते कहोगी  तब ना तुम्हारे दोस्त मित्र यार होंगे बस दिल में उसके ही  जज्बात होंगे तब मैं कुछ सवाल करूंगा हो सके तो खुद को जवाब देना  कहां गयी वो पाबंदियां जो एक लफ्ज़ बोलने से रोकती थीं कहां गए वो लोग जो बेवक्त तुम्हारे पास आते थे और तुम मुझे टोकती थी  कैसे अब तुमक...

घुटन

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 उन्हें पता था मैं घुट रहा हूं  पर उन्हें अपने नये रिश्ते  संवारने थे मुझे वो बेइंतहा चाहते थे  पर उन्हें अपने दामन साफ दिखाने थे मैं बैठा रह जाता था सुबह तक वो अपने ख्वाबों के सफ़र कर आते थे  मैं हंसता था उनके लिए  वो मुझे देख मेरे खुशी का अंदाजा लगाते थे  कभी पूछ लेते थे याद आ रही है क्या  मैं कैसे बताऊं उसे निहारते हम पूरी रात गुजारते थे 

दो सिक्के

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 वो दो अलग-अलग सिक्के उछाल रहे थे  चित भी उनका और पट भी उनका ही था  समझ नहीं आ रहा था नासमझ थे या मुझे खंगाल रहे थे। आज भी मुलाकात में  वो मुझसे मेरी तरह ही मिलती है कहती है तुम सा मुझ में कहां कोई पर फिर उसकी निगाहें पल में बदलती हैं कहती है उसका(उसके नये महबूब) मेरे सिवा कहां कोई वो तो अब मुझे अपने महबूब के फसाने सुनाती है मैं उतना दिवाना कहां बड़ी शौक से जताती है!

मौजूदगी

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  मैं नहीं कहता कि प्यार में उसके सच्चाई ना थी  बात बस इतनी सी है मेरे नसीब में बेवफाई थी वो शायद वक्त के साथ किसी और का होता रहा  मैं बेफिजूल में उसकी याद में दिन रात रोता रहा  अब महफ़िल में उसके दिलदार कोई और हो गया  मैं खड़ा आज भी वहीं जहां मेरा सब कुछ खो गया  अब उनकी दलीलों पर मैं मन मुताबिक मुस्कुराता हूं  वो कहते हैं वो खुश हैं मैं अपने क़दम पीछे बढ़ाता हूं अब उनकी बातों में किसी और की मौजूदगी नज़र आती है बीते लम्हों की उनकी जिंदगी से रवानगी समझ आती है तब जिनकी नजरें दावे करती थीं  मुझे कभी नहीं भुलाएंगी आज वो बयां कर रहीं थी मेरी ना मौजूदगी अब उनको और नहीं सताएगी और  वो अब मुझे बड़े आसानी से समझाते हैं उन्हें आदत है उनके महबूब की उनकी निगाहें कहती हैं तुम जाओ अब मुझे जूस्तजू है बस  अपने सूकून की

अंदाजा

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  जाते-जाते वो मुझसे अब बार बार कहती है  तुम्हारी आंखें इतना बरसती हैं पता नहीं था तब  मैं सोचता हूं क्या सच में मुझे भी पता नहीं था  वो इतना जो जताता था "क्या बस दिखाता था?"  मुझे बिल्कुल अंदाजा नहीं था वो इतने हिम्मतवार होंगे टूटता देखकर भी मुझे ऐसे सवालों के तलबगार होंगे अब  अफसोस होता है मुझे उन लम्हों पर  जिसमें मैं खुद को कोसता रहता था ना जाने कितने रुमाल आज भिगे होंगे  ना जाने कितने अरमान आज टूटे होंगे मेरी वजह से वो आज मुझसे रुठे होंगे!

आखिरी मुलाकात

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 आखिरी मुलाकात में मैंने मांगा तो था नहीं कुछ, ना तेरे पास आये थे ,मुझे पता था अपना दायरा, ना तुझे मिटाने के लिए मजबूर कराये थे पर तेरी उस बात ने बीते लम्हों का सब कुछ मिटा दिया बात बहुत बड़ी नहीं थी पर एक पल में ही गैर होने का एहसास दिला दिया ऐसा था नहीं की मैं तुमको छू देता और रही बात देखने की तो मैं क्या शायद घर के और भी लोग तुझे वैसे कभी न कभी देख लेंगे शायद मेरी नज़रों पर तुमको भरोसा नहीं था तुमको शक था कहीं नजरें मेरी दगा ना कर जाएं पर मुझे मेरे कायदे पता हैं, "अगर तुमने ना बोला है" तो अपने दायरे पता हैं चलो कोई नहीं मुझे मेरे दायरे समझाने के लिए ,मुझे मेरी हदें बताने के लिए तुम्हारा शुक्रिया पल भर में ही ऊंचाई से नीचे गिराने के लिए शुक्रिया शायद अब मुलाकात ना हो तुम रहो खुश अपनी दुनिया में खुदा करे जल्द ही वो दिन भी आए जब हमारी कभी बात ना हो 

आजाद

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 क्या तेरा चेहरा कभी उसकी बाहों में होकर मेरे लिए उतरता है या हर बात पर उसकी तेरा चेहरा बेवजह खिलता है और  अगर हकीकत में तेरे चेहरे का रंग बस मुझे देख कर बदलता है उसके साथ होने पर तेरे मन में मेरा कभी ख्याल भी नहीं संभलता है तो सच मान तेरा मन में बस मेरे लिए मलाल मचलता है अब तेरे रुह का किरदार उसकी बाहों में संभलता है ऐसा है  जा तुझे खुद से आजाद किया मैंने मान लिया खुद को खुद से बर्बाद किया मैंने खुदा की कसम अब जो कभी तेरे लिए फ़रियाद किया मैंने रहम़ ना कर मुझ पर तेरे नये महबूब के लिए तेरा दिल आबाद  किया मैंने ।

किरदार

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  मुझे देखकर वो रोता बहुत है  पर कुछ ही देर में चैन से सोता बहुत है  कहता है सुकून का जरिया हूं मैं उसके पर देखा है मैंने हजारों के साथ सुकून से होता बहुत है नहीं कहता मैं कि सबको चाहता वो है  पर औरों से अटखेलियां दिखाती हैं उसे चाहने वाले बहुत हैं हां  उन हजारों की भीड़ में मेरा भी एक किरदार -ए-वजूद था उसकी खातिर  मैं खुद को सबसे दूर कर बैठा मुझ पर इल्ज़ाम बहुत था और सुनो वो खुद को संभालने में माहिर इतना निकला जिसको जैसी जरुरत थी उससे वो वैसे मिला पर मैं इस कदर टूट गया मेरा ग़म सबके सामने यूं ही आंखों से बेवक्त छलक निकला  खता उसकी भी ना थी मजबूरियां खूब बताई थी उसने  मैं तो मान भी गया नादानियां मुझसे हुई जो इस दिल ने नजदिकियां बढ़ाईं थी उससे  पर ज़हन में एक सवाल हर वक्त गुंजता है कैसे कोई आंखों से देखे तभी एहसासों में पिघलता है ? ओझल हुआ नहीं कि चंद लम्हों में कैसे उसका रवैया बदलता है ? पूछो अगर तो कहता है, क्या करूं सबकी अपनी-अपनी जगह मैं मुकम्मल करता हूं  तुझे क्या पता है मैं किस तरह अपने आप को बदलता हूं फिर क्या  इन दो चार जवाबो...