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##ज़हन और तुम

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                          शिकायतें बहुत हैं तुमसे ,                         पर  मेरी कवायदें भी तुम्हीं हो ।                               मैं रूठ जाऊं तुमसे,                           पर मेरे दायरे भी तुम्हीं हो ।                         रियायतें बख्शीं  हैं तुमने ,                           पर किसी और के लिए ।                         आदतें भी बदल ली हैं तुमने,                           पर किसी और के लिए ।                ...

#विशेष

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#तोहफा

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                          कम्बख़त जज़्बात ऐसे हैं कि ,                   एहसास ना होने की कभी खता नहीं करते।              तू है मेरे मुकद्दर में ख़ुदा के नायाब तोहफ़े की तरह,                 बस हम कभी लफ़्ज़ों में इसे बयां नहीं करते।

#दायरे

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 मुझे मेरे दायरों के मुताबिक जीना आता  है , तेरी खामोशियों से भी खुद के लिए वक्त को पिरोना आता है।  तू  बेरुखी से नजरें फेर ले तो क्या! तेरी दी हुई तन्हाइयों से भी समंदर को भिगोने आता है । वक्त मेरे लिए तेरे कहने से चलता है , वक्त मेरे लिए तेरे कहने से चलता है  फिर कभी कभी एहसास होता है वक्त बस मेरा नहीं सबका बदलता है।

#मन

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  मन एक क्षुद्र प्राणी की तरह होता है पल भर में ख़ुश तो दूसरे पल ही हताश होता है। एक से ख़फ़ा हो गया तो क्या हुआ , उसी वक्त में उसे दूसरे से जुड़ी खुशियों का एहसास होता है । हम सोचते हैं कि बस हमारा चलता है इस पर ,लेकिन समय समय पर ये अपने चर्म सीमा पर सवार होता है। अधिकतर ये उसकी ओर भागता है जिसको हमसे ना कोई दरकार होता है। इसकी गहराईयों को समझने में अपना सारा जीवन बीत जाता है और सामने वाले कहते हैं ' मुझसे अच्छे से तुम्हें कौन समझता ' । वक्त वक्त की बात है बस समय ही नहीं ये बिचारा "मन" भी बदलता है। तुम्हें कुछ लम्हें लगते हैं खुद को संभालने में, मेरा थोड़ा अलग है लम्हें मुझे याद दिलाते रहते हैं बीते पल को ना भूलाने की । वैसे तो बहुत मजबूत होते हैं इरादे मेरे फर्क नहीं पड़ता किसी की भी बात का , मुझे तो याद भी नहीं ज़माना हो गया था मेरी आंखों को ........ पर कमजोर हैं  ये आंखें भी, मन ने कल पल भर में एहसास दिला दिया है।

#बचपन

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 कहानी मेरे जीवन के हिस्सों की- बचपन बीत गया ऐसे ,जैसे नादानियां कभी की ही ना हों। फिर आया बड़प्पन , जिम्मेदारियां जैसे पहले से ही जी ली हों।  अब आने वाले कल से भी डर लगता है मुझे, कहीं समाज के इन फैसलों से 'खुशियों की चादर' झीनी ना हों । परत दर परत जिंदगी के हिस्से बीत गए, अपनेपन के किस्से बस अतीत जीत गए।

#ख़ता

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ख़ता तुम्हारी कहां वक्त तो मेरा बदल रहा है ! कोशिश मैं कर रहा हूं कश्मकश को मिटाने की बीती बातों को शब्दों में जताने की। 'मन 'अंदर से खुद को मना रहा है सही ग़लत के मायने सिखा रहा है तुम्हारी यादें तो ज़हन से ना जा पायेंगी ख्वाहिश है! अब कभी आंखें  ना फिर तुमसे टकराएंगी । क्या पता ये दिल फिर खुद को मना  ना पाए   तू नज़र आए तो नज़र अंदाज़ करने की कीमत चूका ना पाए। सच को परछाईं बनाउंगा तेरे दिए हुए सबक जल्द सीख जाउंगा ख़ता एक छोटी सी मैं भी कर जाउंगा जिंदगी को वक्त बदलने के मोड़ पर ले आऊंगा।

खामोशी

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  खामोशी से गुफ्तगू करते हुए किरदार जिंदगी का निभा रहे हैं, बेख़ौफ़ निकल पड़े हैं उन रास्तों पर जहां सिसकियां बादल बनकर छा रहे हैं। अपने तराजू लिए खड़े हैं,  कसौटी पर खरे उतरे की नहीं गैर माखौल उड़ा रहे हैं , जिम्मेदारियों के बोझ से , 'जीवन' आंखें बंद कर रंजिशो से अब जी चुरा रहा है , पर थककर हार जाना , खुद को खुद से  यूं बेरंग दिखाना इतना आसान कहां? 

#समय

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                       समय  कुछ सुना रहा है अनकही दास्तां चलने के लिए रास्तों को बदलना बता रहा है। खामोशी को आज पंख लगा कर  आसमान में नजरों से उड़ना सीखा रहा है । थके हुए इन सपनों को  दौड़ में जितने का एहसास दिला रहा है।